भारत-अमेरिका संबंधों की नई वास्तविकता

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यह लेख बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों में भारत-अमेरिका संबंधों की नई वास्तविकता को दर्शाता है। आर्थिक, तकनीकी और रक्षा सहयोग बढ़ने के बावजूद, दोनों देशों के हितों और रणनीतिक स्वायत्तता में अंतर है।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच फ्रांस में 2026 जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान हुई अनौपचारिक भेंट ने भारत-अमेरिका संबंधों को एक सकारात्मक बल प्रदान किया हैं। हालाँकि, हाल के भू-राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में दोनों पक्षों ने ऐसी नीतियां व दृष्टिकोण अपनाए हैं जो प्रायः एक-दूसरे के राष्ट्रीय हितों के अनुकूल नहीं थे। लेकिन जैसा कहा जाता है, भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी का एक व्यापक और अधिक गहरा आयाम है।

डोनाल्ड ट्रंप की हालिया चीन यात्रा और उसके बाद अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का भारत दौरा केवल दो अलग-अलग कूटनीतिक घटनाएं नहीं हैं। इन्हें एक साथ देखने पर वैश्विक राजनीति का वह जटिल परिदृश्य सामने आता है, जिसमें भारत और अमेरिका अपने संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश कर रहे हैं। एक तरफ वाशिंगटन, बीजिंग के साथ संवाद और तनाव कम करने के रास्ते तलाश रहा है, वहीं दूसरी तरफ वह नई दिल्ली को यह भरोसा भी दिलाना चाहता है कि भारत उसकी इंडो-पैसिफिक रणनीति का एक केंद्रीय साझेदार बना रहेगा। यही द्वंद्व भारत-अमेरिका संबंधों की सबसे बड़ी वास्तविकता है।

पिछले एक दशक में भारत और अमेरिका के बीच अभूतपूर्व नजदीकियां देखने को मिली हैं। रक्षा सहयोग, तकनीकी साझेदारी, सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, आपूर्ति शृंखलाओं का पुनर्गठन और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग ने दोनों देशों को पहले से कहीं अधिक करीब ला दिया है। लेकिन यह मान लेना कि दोनों देशों के हित पूरी तरह एक जैसे हैं, वास्तविकता से दूर होगा। ट्रंप की चीन यात्रा ने एक बार फिर याद दिलाया है कि अमेरिका की विदेश नीति का अंतिम उद्देश्य अमेरिकी हितों की रक्षा करना है, भले ही उसके लिए उसे अपने सहयोगियों की अपेक्षाओं से अलग रास्ता क्यों न अपनाना पड़े।

भारत के लिए यह कोई नया अनुभव नहीं है। इतिहास ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा पड़ा है। 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान अमेरिका ने पाकिस्तान का समर्थन किया, जबकि भारत ने अपने सुरक्षा हितों के अनुरूप निर्णय लिए। शीत युद्ध के दौरान भी दोनों देशों के बीच गहरे मतभेद रहे। 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिका ने भारत पर प्रतिबंध लगाए, लेकिन कुछ ही वर्षों में वही अमेरिका भारत को एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति के रूप में देखने लगा। इन घटनाओं से एक बात स्पष्ट होती है कि भारत-अमेरिका संबंध बदलते हितों और परिस्थितियों के आधार पर विकसित हुए हैं।

इसी संदर्भ में ट्रंप की चीन यात्रा का महत्व बढ़ जाता है। पिछले कुछ वर्षों में भारत-अमेरिका साझेदारी का एक महत्वपूर्ण आधार चीन की बढ़ती शक्ति और उसके प्रति साझा चिंता रही है। लेकिन यदि वाशिंगटन स्वयं बीजिंग के साथ संवाद और समझौते की संभावनाएं तलाश रहा है, तो नई दिल्ली के लिए यह संकेत है कि किसी भी रणनीतिक साझेदारी को केवल एक साझा प्रतिद्वंद्वी के आधार पर नहीं समझा जा सकता। अमेरिका, चीन को एक साथ प्रतिस्पर्धी, प्रतिद्वंद्वी और आवश्यक आर्थिक भागीदार तीनों रूपों में देखता है। भारत की चिंताएं अलग हैं, क्योंकि उसका चीन के साथ प्रत्यक्ष सीमा विवाद और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा का प्रश्न जुड़ा हुआ है।

यही कारण है कि ट्रंप की बीजिंग यात्रा के तुरंत बाद मार्को रुबियो का भारत दौरा महत्वपूर्ण संदेश लेकर आया। यह भारत को आश्वस्त करने का प्रयास भी था कि अमेरिका की चीन नीति में किसी संभावित बदलाव का अर्थ भारत की रणनीतिक उपयोगिता में कमी नहीं है। रक्षा उत्पादन, उन्नत तकनीक, समुद्री सुरक्षा, क्वाड और आर्थिक सहयोग जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों की साझेदारी लगातार आगे बढ़ रही है। अमेरिका समझता है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिर शक्ति संतुलन बनाए रखने में भारत की भूमिका अनिवार्य है, जबकि भारत भी मानता है कि आर्थिक और तकनीकी आधुनिकीकरण के लिए अमेरिका एक महत्वपूर्ण साझेदार है।

फिर भी, इस रिश्ते की सतह के नीचे कई ऐसे प्रश्न हैं जो समय-समय पर तनाव पैदा करते रहते हैं। रूस से ऊर्जा आयात, वैश्विक व्यापार नीतियां, डॉलर-आधारित वित्तीय व्यवस्था, बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार और चीन के साथ संबंधों की प्रकृति जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के दृष्टिकोण पूरी तरह समान नहीं हैं। यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने जिस तरह अपनी स्वतंत्र नीति अपनाई, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि नई दिल्ली किसी भी वैश्विक संकट में वाशिंगटन की प्राथमिकताओं को स्वतः अपनी प्राथमिकता नहीं मानती।

दरअसल, भारत-अमेरिका संबंधों में सबसे बड़ी चुनौती विश्वास की कमी नहीं, बल्कि अपेक्षाओं का अंतर है। अमेरिका अक्सर चाहता है कि भारत उसकी व्यापक रणनीतिक योजनाओं में अधिक स्पष्ट और सक्रिय भूमिका निभाए। इसके विपरीत भारत अपनी विदेश नीति को रणनीतिक स्वायत्तता के सिद्धांत पर आधारित रखना चाहता पिछले कुछ वर्षों में भारत ने इसी सोच के अनुरूप बहुआयामी कूटनीति अपनाई है। अमेरिका के साथ संबंध मजबूत करने के साथ-साथ उसने यूरोपीय संघ, जापान, ऑस्ट्रेलिया, खाड़ी देशों और अफ्रीका के साथ भी अपने जुड़ाव का विस्तार किया है। रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा संबंध बनाए रखे गए हैं, जबकि चीन के साथ सीमा पर तनाव के बावजूद संवाद की प्रक्रिया पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। यह संतुलन साधना आसान नहीं है, लेकिन यही भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी विशेषता बन चुका है।

जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप की बैठक में दोनों नेताओं ने एक “संतुलित, पारस्परिक रूप से लाभकारी तथा वाणिज्यिक दृष्टि से सार्थक” भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को शीघ्र अंतिम रूप देने के बात कही। इसके साथ ही समुद्री सुरक्षा, भारतीय नाविकों की सुरक्षा, आपूर्ति शृंखलाओं की स्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग जैसे विषय चर्चा के प्रमुख केंद्र रहे।

भारत-अमेरिका संबंधों को किसी स्थायी मित्रता या अस्थायी मतभेद के चश्मे से देखने के बजाय उन्हें परिपक्व रणनीतिक साझेदारी के रूप में समझना होगा। दोनों देशों के बीच सहयोग के क्षेत्र विशाल हैं, लेकिन असहमति के मुद्दे भी वास्तविक हैं। यही कारण है कि यह रिश्ता न तो असीमित उत्साह का विषय है और न ही निराशा का। यह एक ऐसा संबंध है जो साझा हितों, प्रतिस्पर्धी प्राथमिकताओं और बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच लगातार विकसित हो रहा है। नई दिल्ली-वाशिंगटन के बीच संबंधों की वास्तविक शक्ति इस बात में नहीं है कि दोनों हर मुद्दे पर सहमत हैं, बल्कि इस तथ्य में है कि वे असहमति के बावजूद सहयोग करने की क्षमता रखते हैं।

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